
मेरी चन्द मुट्ठी भर खुशियाँ , उसके हिस्से का थोडा सा खुला आस्मां और कुछ बिखरी हुई सी संवरती यादें ......पता है, कभी कभी ज़िन्दगी की कुछ सकरी गलियाँ आपको उस छोटे से वक़्त में , यूही जाने अनजाने में बहुत सी ऐसी खुशियाँ दे जाती है, जिनपर आपका हक तो नहीं होता है , पर फिर भी हम बेवजह बस थोडा सा लालची हो जाते है। अगर देखा जाए, तो ये लालच भी अपने आप में काफी इमानदार और मासूम होती है , एकदम वही लालच जिससे हम बचपन में धुप को अपनी अपनी मुट्ठी में कैद करने की नाकाम कोशिश करते थे। आज बचपन तो नही है लेकिन फिर भी , आज बरसों के बाद ऐसा लगता है की , गिनती के कुछ उधार के पल मिले है , कुछ ऐसा ही था वो मेरा एक लम्हा अपना सा.......
आज सब कुछ मेरा सा है , मेरे साथ सब मेरे अपने ही हैं ... मेरी कम चीनी कम चाय ...वो भी मेरे अपनेa बड़े सेa कप में , मेरी अपनी वही जानी पहचानी बारिश की आवाज़...........इस बार फिर से बारिश ने मुझे भिगो दिया, आज सब कुछ एकदम पहले जैसा है , आज फिर से क्यूँ मेरा यकीन दोहरा रहा है और कह रहा है की तुम ज़रूर आओगे ......
खुश हो गयी थी मैं क्यूँ यूहि, ये क्या मेरी बारिश में फिर से तुम आये हो ......धुन्दला सा क्यूँ दिख रहा है मुझे आज सब कुछ.....शायद मै भूल गई हूँ की इन बेरूह सी आँखों को अब कुछ नहीं दिख सकता ...सिर्फ महसूस हो सकता है एक लम्हा अपना सा। ...............
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