
आज फिर दिन का रंग गहरा है, मैंने महसूस किया है, बारिश की चंद बूंदों को अपनी उँगलियों पे , आइना देखा तो यादों की खिडकियों पर ज़ोर ज़ोर से पड़ने वाली बूँदें , आज मुझे फिर से किसी पुरानी सकरी गली में खींच ले गई। सब कुछ वैसा ही था पर वो एक दिन जब मैंने जाते वक्त अपनी चीज़ें ऐसे ही छोड़ी थी पर आज आकर देखा तो वहां मेरा सा कुछ रहा ही नही।
अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है, जब मुझे पता लगा की जीवन का बसंत क्या होता है.... सब कुछ अच्छा सा लगने लगा था,सारी कलियाँ जैसे जशन में शामिल होने के लिए खिलने लगी थी। मैं और तरुण १२वि कक्षा में साथ में थे। वो मेरे पीछे से तीसरे कोने की सीट पर बैठता था। मुझे वो बिल्कुल पसंद नही था। पता नही क्यूँ लेकिन मुझे उसकी हर एक बात से नफरत थी, उसके उठने बैठने का ढंग मेरी नफरत को और भी गहराता था।
आज फैरवैल था, एक अजीब सा मिला जुला अहसास था। एक तरफ़ स्कूल के साथियों से अलग होने का दुःख और दूसरी तरफ़ ज़िन्दगी का सपना कुछ कर दिखाने का। आज हमेशा की तरह मैं बहुत खूबसूरत लग रही थी। आसमानी रंग की साड़ी, कमर तक खुले बाल , माथे पर आसमानी बिंदी। और खूबसूरत लगू भी क्यूँ नही , आख़िर हर बार की तरह मिस फरेवेल का खिताब तो मुझे ही मिलना था। और आख़िर वो घड़ी आ ही गई जब प्रिंसिपल सर ने स्टेज पर मेरा नाम पुकारा, मुझे खुशी तो बहुत हुयी पर अचम्भा नही हुआ क्यो की मुझे पता था की ये खिताब तो बस मेरा ही है। घमंड नही ये विश्वास था। मुझे हमेशा से ही ये अहसास होता था की मैं किस्मत वाली हूँ।
उस दिन की सिसकियों में स्कूल की सब खट्टी मीठी यादें सब ताज़ा हो गई। मैं आज सबसे मिली, सबसे गले भी मिली पर तरुण से एक बार भी नही मिली। सभी से आशीर्वाद लिया और कदम बढाया एक एकदम नई दुनिया की तरफ़। अब मौका था सबके सपने सच कर दिखाने का। अब मन में सवाल आया की ग्रैजुएशुन किस स्ट्रीम से किया जाए? अगर कॉमर्स से करू तो हो सकता है तो अकाउंट या फिर बैंक में आगे निकल जाऊ, अगर आर्ट्स में करू तो हो सकता है आगे चलकर सिविल सर्विसेस में लग जाऊ, पर मन का पलड़ा बार बार साइंस की तरफ़ ही जा रहा था क्यूंकिआखिरकार मेरे मन में वर्षों से एक ही इच्छा थी, रिसर्च साइंटिस्ट बनने की। कई बार हमें पता होता है की हमें क्या करना है फिर भी कम ख़ुद अपने लिए विकल्पों की भीड़ बढ़ाते है, खैर ज़माना ही विकल्पों का है लेकिन मेरे पापा को मेरे साइंटिस्ट बनने में कोई ख़ास रूचि नही थी । वैसे भी कई बार पसंद और नापसंद होने के कोई कारण नही होता है।
एक चीज़ तो पक्की थी, रिसर्च साइंटिस्ट बनने का पहला कदम, मैंने झट से BHU में अपने अड्मिशन के लिए अर्जी भेज दी। अब उथल पुथल होने लगी की अड्मिशन होगा भी या नही । इस समय जब के ये सिर्फ़ अपने घर में ही सुनते है की मेरा बेटा/ बेटी बड़े इंटेलिजेंट है, अरे बाहर निकल के देखो तो सभी शेर है। पर मैं १२वि में काफ़ी आचे नम्बरों से पास हुई थी , इसलिए BSc. बीएससी में अड्मिशन तो मिल गया पर क्लास में पहली बार गई तो अहसास हुआ की एक से एक धुरंधर पड़ा हुआ है। मेरा PCM ग्रुप था। इसमे मुझे सबसे ज्यादा रूचि केमिस्ट्री में थी क्यूंकि मुझे केमिस्ट्री में ही रिसर्च साइंटिस्ट बनना था। काफ़ी रूचि थी मेरी केमिस्ट्री में। BSc के परीक्षा में जान लगा दी। दिन क्या रात क्या सब एक तरफ़ रिसर्च साइंटिस्ट बनने की चाह एक तरफ। आज परीक्षा का रिसल्ट आना था। दिल की एक तेज धड़कन लिस्ट में अपना नाम देख रही थी। अरे वो रहा ...!! लेकिन ये क्या ये तो तीसरे नम्बर पे था। क्या यार इतना करो भी ...फिर भी ..चलो अब कर भी क्या सकते है ..बिखरते हुए उत्साह को बटोरकर जामिल्या मिलिया में MSc का फॉर्म भर दिया। दो साल कैसे गुजर गए पता ही नही चला। जितना वक्त करीब आता जा रहा था , उतना ही रिसर्च साइंटिस्ट बनने की चाह दुगनी होती जा रही थी।
अब आ रही थी असल मंजिल MSc में भी ठीक ठाक नम्बरों से पास हो गई ...अब तो बस आखिरी कदम और मैं डॉ तनुश्री मोहन, रिसर्च साइंटिस्ट। क्यूंकि प्रोफेसरो से काफ़ी अच्छी बनने लगी थी तो जामिया में ही PHD शुरू कर दी। अब लगा था की कोशिशे रंग ला रही है। एक- एक कदम मेरे सपने की तरफ़ लंबे-लंबे कदम बढ़ा रहा था। सब कुछ वैसा ही था जैसा मैंने सोचा था... अरे ये क्या ये स्मार्ट सा लड़का कौन है ?? कुछ जाना पहचाना सा लगा, पास जाके देखा तो .....Oh my God !!! ये तो तरुण था ..जिससे मैं स्कूल के दिनों में सबसे ज्यादा नफरत करती थी ..Oh my God !! I can't believe it तुम कुछ देर तक तो मेरे मुह से जबान ही गायब हो गई हो। दिन बीते धीरे-धीरे तरुण के लिए ढेर नफरत ढेरो प्यार में बदल गई....मुझे वो अच्छा लगने लगा था। अब हम एक ही लैब में थे । इसीलिए शायद प्यार गहराने लगा , बात इतनी बढ़ गई की तरुण के घरवाले मेरे घर पर भी आ गए , हमारी सगाई की तारीख भी निकल गई । अब लगता है की सब कुछ साथ में ही आना था। बात कुछ ऐसी फँसी की जिस दिन मेरी सगाई थी उसी दिन मुझे अपनी रिसर्च का फ़ाइनल मोलेक्युल बनना था। बहुत कोशिश की माँ ने बड़े ज्योतिषी बुलाये लेकिन उसके बाद की तारीख फिर एक साल बाद थी। मेरे होने वाले ससुराल वाले भी मुझे बहुत प्यार करते थे, मेरी सास को कही न कही इस बात का घमंड ज़रूर था की मेरी बहू बहुत सुंदर है।
तो जिस दिन का इंतज़ार था आख़िर वो आ ही गया , मेरी दो सबसे प्यारी चीज़ें आज के दिन मुझे मिलने वाली थी। I was feeling lucky today एक मेरा रिसर्च मोलेक्युल और दूसरा तरुण। माँ का बार बार फ़ोन आ रहा था की "जल्दी घर आओ, सब तैयारियां करनी है और तुम्हे तैयार भी तो होना है" । बस 15 मिनट और माँ ..अच्छा सुनो तरुण को भेज रही तुम्हे लेने के लिए। उसी महंगी सूद सारे महंगी और ऐसा कहते हुए माँ ने फ़ोन रख दिया। फिर कुछ कहने लगी तो मैंने टोक दिया और कहा माँ ये खतरनाक केमिकल है, ज्यादा जल्दी मत करो ...क्या ये माँ भी ना.....
बस कुछ मिनट तक testube में तरह तरह के एसिड डालकर गरम करने लगी ...और क्या देखती हूँ....मेरी बरसों का सपना मुझे testube में दिखने लगी थी। मेरा रिसर्च मोलेक्युल बन चुका था। इतनी खुशी इतनी खुशी की .....एकदम बगल में खड़ी लड़की को ज़ोर से पकड़ लिया .आज फिर मेरा वो विश्वास और भी पक्का हो गया की मैं सच में किस्मत वाली हूँ। जिस चीज़ को पाने में लोगों को 5-7 साल लगा जाते है, वो मैंने सिर्फ़ 3 साल में ही कर के दिखा दिया। अब बस सबसे पहले तरुण को ही बताना था, खुशी दुगनी हो गई जब तरुण को आते हुए देखा। कोई और न बोल दे इसलिए जल्दी-जल्दी में testube हाथ में लेकर तरुण के पास भाग कर जाने लगी .एकदम से लैब में पड़े dustbin टक्कर हो गई....और testube मेरे हाथ से मेरे पूरे मुह पे था ....
सब चला गया, सारा भ्रम मिट गया .....पूरी पहचान खो गई ..सब कुछ ..लेकिन मेरा रिसर्च मोलेक्युल बन चुका था। मैं डॉ तनुश्री मोहन, रिसर्च साईंटिस्ट बन चुकी थी... पर कभी कभी कुछ खुशियों का असल उसकी सूद से कहीं ज्यादा होता है..
Good Story
ReplyDeletesu aaj pehli baar maine tmhari lekhni padi hai,,,mai koi bahut bada lekhak to nahi ke ese accha ya bura kaho...par pad kar esa laga jaise sab kch aankho ke saamne ho raha ho,,esa laga jaise mai ya har koi jo es kahani ko padega,,usme khud ko payega,,,es kahani ko padh kar mjhe esa laga jaise tmne zindgi ka sach bahut jaldi samjh leya hai,,,ke Zindagi me aap ko sab kch nahi milta,,,but ur wirting is vry pure which shows tht tm andar se bahut saaf ho,,koi chal kapat hai he nahi...
ReplyDeleteU have written a very nice story.;)
it's a very engaging story with an unexpected twist in the end,,, your descriptive capability is pretty good,,, well written :)
ReplyDeleteWhoa .. what an unexpected chain of events .. too good, you really know how to weave the rhythm effortlessly ...
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