दिन बुधवार, महीना डिसेंबेर का, 19 तारीख , आज काल मेरा ऑफ थोड़ा जल्दी हो जाता है, इसके चलते मई घ्रर भी जल्दी पहुच जाती हूँ। घर आते समय जब रास्ते मे ड्राइव कर रही होती हूँ तो बस दिमाग मे यही होता है की कैसे जल्दी घर पहुचु क्यूंकि वहाँ मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही मेरी बेटी गेट की तरफ दौड़ पड़ती है. मुझे बहुत अक्छा लगता है जब वो मुझे किसी को छुने नहीं देती, ना ही मेरा समान किसी को हाथ लगाने देती है। एनीवेस मुद्दा आज मेरी बेटी का नहीं बल्कि संगीता आंटी का है।
आइये आपकी पहचान कराते हैं संगीता आंटी से। …।
बात अगर रंग कि करें तो मै कहूंगी "नो कमेंट्स "। उम्र तक़रीबन ६० साल कद करीबन ४ फुट कुछ इंच सर पर कुछ खिचड़ी बालों का जुड़ा, बदन पर ज्यादातर सूती धोती होती है, और हाँ जीरो फिगर है बंदी का और वो भी माइनस में .… मेरे ऐसा कहने से आपने सोचा होगा मस्त बेब्स टाइप्स आंटी कि बात हो रही है। …नही ! मुझे थोडा और ऐड करने दीजिये।। मोहतरमा के मुह में पान मसाला भी होता हैं और पैरों में घिसी हुई हवाई चप्प्ल .…
सही मायने में बोलूं तो वो मेरे घर की एक बहुत इम्पोर्टेन्ट लाइफलाइन है.…। आज घर पर गैस ख़त्म हो गयी थी, और घर वालों के काफी गणित लगाने पर भी कुछ जुगाड़ बन नहीं पा रहा था। फिर क्या था लाइफलाइन जीवित हो गयी और बोली कि लाइए हमें एक जगह पता है जहाँ पर छोटा सिलिंडर भर जाता। फिर क्या था सबके चेहरो पर कोलगेट वाली स्माइल आ गई। . आंटी ने छोटे सिलिंडर को अपने दाहिने हाथ में उठाकर कहा 'अभी आते हैं'. अच्छा हाँ हम उन्हें इसलिए लाइफलाइन बुलाते हैं क्यूंकि वो किसी काम के लिए मना नहीं करती हैं. घर वालों ने कहा कि रिक्शा से चली जाओ. लेकिन फिर किसी ने मुझसे कहा कि अरे स्कूटी से चली जाओ. फिर क्या था संगीता आंटी और मै ,चल पड़े स्कूटी पर, छोटा वाला सिलिंडर लेकर।
मै तो रोज़ कि तरह ही स्कूटी चला रही थी लेकिन नया तो उनके लिए था. वो मेरे पीछे बैठी और उन्होंने मेरे दाहिने कंधे पर हांथ रख रखा था. और मुझे बार बार केह रही थी कि बहु संभल के चलाना। मुझे अपने शीशे में दिख रहा था कि वो काफी खुश हैं.।
वो बिलकुल वैसे ही खुश हो रही थी जैसे मेरी मम्मी खुश होती थी जब वो मेरे साथ स्कूटी पर जाती थी. पापा उन्हें अपने साथ कार में भी ले जाते थे लेकिन फिर भी वो मेरे साथ स्कूटी पर ज्यादा खुश होती थी और हमेशा मेरे दाहिने कंधे पर अपना हांथ रखती थी जैसे कि आज आंटी ने रख रखा था और वो भी हमेशा संभल कर चलने को कहती थीं.
चलिए मम्मी की बातें कभी किसी और पन्ने में करेंगे आज तो बात संगीता आंटी कि है. रास्ता काफी खराब था पर फिर भी पार हो गया। तकरीबन १० मिनट्स की स्कूटी राइड के बाद आख़िरकार हम मंजिल पर पहुँच ही गयें। संगीता आंटी स्कूटी से उतरी और सिलिंडर को लेकर दुकान पर चली गयीं। मैंने स्कूटी पर बैठी रहीं और पैरों पर ही टिका रहने दिया। ।
अभी सोच ही रही थी ये कितनी दूर बेचारी पैदल आ रहीं थी। … तब तक देखती हूँ तो संगीता आंटी के पैरों में चप्पल ही नहीं थी। । मुझे लगा शाय़द गिर गयी होगी।।। मैंने एकदम से पूछा अरे चप्पल कहाँ गयीं आपकी ?? तो बड़ा खुश हो कर बोलो अरे बहु गाडी में आये हैं तो चप्पल कि क्या ज़रुरत। ....... वो बहुत खुश थी स्कूटी पर बैठकर। । उनकी ख़ुशी वैसे ही थी जैसे मुझे पहली बार हवाईजहाज पर चढ़ कर हुई थी। ....... आंटी को मैंने थोडा और खुश कर दिया एक पान मसाला खिलाकर।
बस यूँहीं अच्छा सा लगा मुझे और उन्हें भी।